परिचय – उत्तराखण्ड के राज्य प्रतीक चिन्ह (State Symbols of Uttarakhand)
उत्तराखंड के संपूर्ण अध्ययन ब्लॉग सीरीज का यह दूसरा भाग है। पिछले ब्लॉग में हमने उत्तराखंड की सामान्य जानकारी (Uttarakhand at a glance) के बारे में पढ़ा था। यदि आपने वह ब्लॉग नहीं पढ़ा है तो आप यहां क्लिक करके उसे पहले पढ़ें।
उत्तराखण्ड सामान्य ज्ञान (Uttarakhand GK in Hindi) का यह ब्लॉग उत्तराखण्ड के सभी सरकारी नौकरियों की तैयारियों के मद्देनजर तैयार किया गया है।
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इस ब्लॉग में हम उत्तराखंड के राजकीय चिन्हों (list of state symbols of uttarakhand) के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे। यह ब्लॉग थोड़ा लम्बा जरूर है लेकिन इसे विभिन्न स्त्रोतों से प्राप्त जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। इसलिए आराम से समय लेकर हर एक पॉइंट का अध्ययन करें और यदि आप इस जानकारी को कॉपी करते हैं तो कृपया कर हमारी मेहनत का क्रेडिट जरुर दें। चलिए शुरू करते हैं-
वर्ष 2000 में उत्तराखंड राज्य की स्थापना के बाद सन् 2001 में उत्तराखंड राज्य सरकार द्वारा उत्तराखण्ड राज्य के प्रतीक चिन्हों का निर्धारण किया गया था।
उत्तराखण्ड के राज्य प्रतीक चिन्ह (State Symbols of Uttarakhand)
राज्य प्रतीक चिन्ह | नाम |
पक्षी | हिमालयी मोनाल |
पशु | कस्तूरी मृग |
वृक्ष | बुरांश |
राजकीय पुष्प | ब्रह्म कमल |
तितली | कॉमन पीकॉक (नया नाम – वूली ब्रांडेड पीकॉक) |
वाद्य यंत्र | ढोल |
खेल | फुटबॉल |
राज्य गीत | उत्तराखण्ड देवभूमि, मातृभूमि, शत् शत् वंदन अभिनंदन… |
मछली | स्वर्ण महाशीर |
प्रथम राजभाषा
द्वितीय राजभाषा |
हिंदी
संस्कृत |
आईये अब एक-एक कर उत्तराखण्ड के राजकीय चिन्हों के बारे में जानते हैं-
उत्तराखण्ड का राज्य चिन्ह (State Emblem of Uttarakhand)

उत्तराखंड के राजकीय चिन्ह में उत्तराखंड की भौगोलिक दृष्टि का एक रूप देखने को मिलता है।
उत्तराखंड के राजकीय चिन्ह का आकार हीरे के आकार (Diamond Shape) अर्थात् समचतुर्भुज आकार (Rhombus Shape) का है।
चिन्ह के उपरी भाग में तीन पर्वत चोटियों की श्रृंखला देखने को मिलती है।
मध्य में मौजूद पर्वत चोटी बाकी की दो पर्वत चोटियों से ऊँची है।
बीच की चोटी में अशोक की लाट अंकित है।
अशोक की लाट के नीचे “सत्यमेव जयते” (Satyamev Jayate) लिखा हुआ है। “सत्यमेव जयते” का अर्थ होता है – सत्य की ही विजय होती है (Truth Alone Triumphs)।
“सत्यमेव जयते” मुण्डकोपनिषद (Mundkopanishad) से लिया गया है। मुण्डकोपनिषद या मुण्डक उपनिषद अथर्ववेद (Atharvaveda) से संबंधित है।
अशोक की लाट की पृष्ठभूमि लाल रंग की है (Red background of Lion Capital of Ashoka in Uttarakhand State Emblem)।
अशोक की लाट की पृष्ठभूमि लाल रंग उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान शहीद हुए आंदोलनकारी के रक्त का प्रतीक है।
तीनों चोटियों के नीचे गंगा की चार लहरें देखने को मिलती हैं।
सबसे नीचे नीले अक्षरों में उत्तराखण्ड राज्य लिखा हुआ है।
राजकीय चिन्ह के तीनों पर्वत चोटियों और गंगा की चारों लहरों को नीले रंग से दर्शाया गया है।
उत्तराखंड के सभी राजकीय अथवा शासकीय कार्यों में इसी प्रतीक चिन्ह का मुहर के रूप में प्रयोग किया जाता है।
उत्तराखण्ड का राजकीय पक्षी – हिमालयी मोनाल (State Bird Of Uttarakhand Himalayan Monal)

उत्तराखंड के राजकीय पक्षी का नाम हिमालयी मोनाल है।
हिमालयी मोनाल का वैज्ञानिक नाम लोफोफोरस इम्पेजेनस (Lophophorus Impejanus) है। (Scientific Name of Monal)
यह हिमालय क्षेत्रों में 8000 से 15000 फीट की ऊंचाई में पाया जाता है।
खड़ी ढलान और चट्टानी इलाके में मोनाल का निवास स्थान होता है।
ठंड के मौसम में मोनाल कम ऊंचाई वाले क्षेत्रों की ओर आ जाते हैं।
मोनाल आहार में मुख्य रूप से पत्तियां, फल-फूलों के बीज, जड़ें और कीड़े-मकोड़े खाते हैं।
मोनाल का प्रिय आहार आलू है।
भोजन के लिए ये अपनी चोंच और पंजों से जमीन को खोदते हैं।
मोनाल की ऊंचाई 1 से 1.5 फीट तक होती है।
मोनाल का प्रजनन का समय मध्य अप्रैल से लेकर मध्य जुलाई तक होता है।
मोनाल अपना घोंसला नहीं बनाते हैं और अपने अंडे जमीन पर ही देते हैं। एक बार में मोनाल 3 से 6 अंडे देते हैं।
हिमालयी मोनाल के अन्य नाम इम्पेयन मोनाल (Impeyan Monal) और इम्पेयन तीतर (Impeyan Pheasant) हैं।
हिमालयी मोनाल को हिमालयी मोर (Himalayan Peacock) भी कहा जाता है।
उत्तराखण्ड की स्थानीय भाषा में हिमालयी मोनाल को मुन्याल, घुर मुनाल, मुनाल, रतनल, रतिया कावाँ आदि नामों से जाना जाता है।
हिमाचल प्रदेश में हिमालयी मोनाल को नीलगुरु नाम से जाना जाता है।
नेपाल में इसे डैनफे (Danphe/Danfe) नाम से और कश्मीर में इसे सुनाल, सिक्किम में चामदौंग, भूटान में बुप नाम से जाना जाता है।
हिमालयी मोनाल भारत में असम, हिमाचल प्रदेश, कश्मीर, नेपाल, पाकिस्तान, चीन के तिब्बत प्रांत और भूटान में भी पाया जाता है।
मोनाल नेपाल देश का भी राजकीय पक्षी है।
हिमालयन मोनाल (लोफोफोरस इम्पेजनस), फासियानिडे परिवार (Phasianidae Family) का एक तीतर (Pheasant) है।
हिमालयी मोनाल का वर्गीकरण इस प्रकार है-
वर्गीकरण – (Taxonomy of Himalayan Monal) | |
Phylum | Chordata |
Subphylum | Vertebrata |
Class | Aves |
Order | Galliformes |
Family (परिवार) | Phasianidae |
Subfamily (उप-परिवार) | Phasianinae |
Genus (जाति) | Lophophorus (Temminck, 1813) |
Species (प्रजाति) | Lophophorus impejanus (Latham, 1790) |
हिमालयी नर मोनाल (Male Himalayan Monal)
नर मोनाल दिखने में मादा मोनाल से अधिक सुंदर होते हैं।
नर मोनाल दिखने में अत्यंत चमकीले रंग के होते हैं।
वयस्क नर मोनाल के सिर का रंग हरे धातु के रंग जैसा होता है।
वयस्क नर के सिर पर ऊपर से पंखों के सिरे जैसे दिखने वाली तारों जैसी चोटी या कलगी होती है।
नर मोनाल के गर्दन के पिछले भाग और बाहरी भाग पर चमकदार हरा धातुई रंग और कांस्य रंग होता है।
हिमालयी नर मोनाल के पंखों और ऊपरी पूँछ पर नीला, बैंगनी और हरा रंग होता है। हिमालयी नर मोनाल की पूँछ भूरे रंग की होती है।
नर मोनाल के पंख लंबे होते हैं।
हिमालयी नर मोनाल की लंबाई 70 से 72 सेंटीमीटर तक होती है।
हिमालयी नर मोनाल का वजन 1.98 किलो से लेकर 2.38 किलो तक होता है।
हिमालयी मादा मोनाल (Female Himalayan Monal)
मादा मोनाल आकार में छोटी होती हैं।
मादा मोनाल के ऊपरी हिस्से का रंग भूरा होता है।
मादा मोनाल के सिर पर एक छोटा गुच्छा या कलगी होती है।
मादा मोनाल के शरीर का निचले हिस्से का रंग हल्का पीला और भूरा होता है। पूंछ वाले हिस्से में हल्का सफेद रंग होता है।
मादा मोनाल की लंबाई लगभग 64 सेमी. होती है।
वजन की बात करें तो मादा मोनाल का वजन 1.8 किलो से लेकर 2.15 किलो तक होता है।
मोनाल का संरक्षण
मोनाल की इस हिमालयी मोनाल प्रजाति के व्यापक विस्तार के बावजूद इसका अवैध शिकार का खतरा बरकरार है।
सर्दियों के दौरान जब मोनाल कम ऊंचाई वाले मानव क्षेत्रों के करीब आते हैं तब इनका अवैध शिकार किया जाता है।
हिमालयी मोनाल भारत के वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 की अनुसूची 1 भाग 3 में सूचीबद्ध किया गया है।
बड़ी संख्या में पाए जाने के कारण हिमालयी मोनाल को IUCN की रेड लिस्ट द्वारा ‘सबसे कम चिंताजनक‘ प्रजाति के रूप में सूचीबद्ध किया गया है (Red List of Threatened Species by International Union for Conservation of Nature)।
उत्तराखण्ड का राजकीय पशु – कस्तूरी मृग (State Animal of Uttarakhand – Alpine musk deer)

उत्तराखंड का राज्य पशु कस्तूरी मृग (Alpine Musk Deer) है।
इसका वैज्ञानिक नाम “मोस्कस क्राइसोगास्टर” (Scientific name of Alpine Musk Deer is Moschus Chrysogaster) है।
Taxonomy of Alpine Musk Deer (अल्पाइन कस्तूरी मृग का वर्गीकरण)
Category | Name |
Kingdom | Animalia |
Phylum | Chordata |
Subphylum | Vertebrata |
Class | Mammalia |
Order | Artiodactyla |
Family | Moschidae |
Genus | Moschus |
Species | Moschus Chrysogaster |
कस्तूरी मृग के बारे में
कस्तूरी मृग हिमालय के ऊंचाई वाले स्थान पर पाए जाते हैं।
कस्तूरी मृग के परिवार का नाम Moschidae और जाति Moschus है।
नर कस्तूरी मृग में खुशबू से महकने वाली एक ग्रंथि होती है। इस ग्रंथि द्वारा इकठ्ठा किये गए द्रव्य का प्रयोग सौंदर्य प्रसाधनों, दवाइयों और इत्र बनाने में किया जाता है।
कस्तूरी मृग की मुख्य रूप से 4 प्रजातियां पाई जाती हैं।
भारत के अलावा कस्तूरी मृग नेपाल, चीन और रूस में भी पाया जाता है।
कस्तूरी मृग समुद्र तल से 2000 मीटर से लेकर 5000 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
हिरण या मृग परिवार से होने के बावजूद कस्तूरी मृग अन्य साधारण मृगों या हिरणों से अलग होते हैं।
कस्तूरी मृग भूरे रंग के होते हैं और उनके शरीर में काले रंग के धब्बे देखने को मिलते हैं।
कस्तूरी मृग का वजन 10 से 15 किलो तक होता है।
नर कस्तूरी मृग के पास नुकीले दांत और पांव में 4 खुर होते हैं। ऊपरी जबड़े में मौजूद दोनों नुकीले दांत मुंह के बाहर की ओर निकले होते हैं और अंदर की ओर मुड़े रहते हैं।
इन दांतों की लंबाई 7 से 10 सेंटीमीटर तक होती है। इन दांतों का इस्तेमाल नर कस्तूरी मृग जड़ों की खुदाई और अन्य जानवरों से स्वयं की रक्षा करने में इस्तेमाल करता है।
कस्तूरी मृग के बाल मोटे होते हैं और पिछले पैर, अगले पैरों से लंबे होते हैं।
कस्तूरी मृग की पूंछ में बाल नहीं होते हैं अर्थात् इनकी पूंछ बाल रहित होती है।
नर और मादा दोनों कस्तूरी मृगों के सींग नहीं होते हैं।
कस्तूरी के सुगंधित द्रव्य का स्राव (secretion) नर कस्तूरी मृग के पेट के निचले भाग में जननांगों के पास से होता है। यह स्राव एक गांठ जैसे दिखने वाले थैले में इकट्ठा होता है।
1 साल की आयु होने के बाद ही नर कस्तूरी मृगों में कस्तूरी बननी शुरू होती है।
एक कस्तूरी मृग में लगभग 30 से 45 ग्राम कस्तूरी पाई जाती है।
कस्तूरी मृगों की सूंघने और सुनने की शक्ति बहुत तेज होती है।
नवंबर और दिसंबर माह कस्तूरी मृगों का प्रजनन का समय होता है। और कस्तूरी मृग के बच्चे पैदा होने में 6 माह का समय लगता है।
कस्तूरी के कारण ही कस्तूरी मृगों का अवैध शिकार किया जाता है। जैसा कि पहले बताया है कस्तूरी सिर्फ नर मृगों में पाई जाती हैं लेकिन दोनों नर और मादा देखने में एक जैसे दिखते हैं इसलिए दोनों का अवैध शिकार होता है।
कस्तूरी मृग उत्तराखंड के उच्च हिमालयी जिलों पिथौरागढ़, चमोली और उत्तरकाशी में पाए जाते हैं।
कस्तूरी मृगों की संख्या में गिरती कमी को देखते हुए भारत सरकार द्वारा इन्हें संरक्षित प्रजाति की श्रेणी में रखा है।
वर्ष 1972 में चमोली जिले के केदारनाथ वन्य जीव प्रभाग के अंतर्गत कस्तूरी मृग विहार की स्थापना की गई थी (Kedarnath Wildlife Sanctuary)।
वर्ष 1974 में कस्तूरी मृग अनुसंधान केंद्र बागेश्वर जिले के महरूड़ी नामक स्थान में स्थापित किया गया था (Musk Deer Research Centre Mehruri)।
कुछ किताबों में महरूड़ी कस्तूरी मृग अनुसंधान केंद्र की स्थापना वर्ष 1977 लिखा गया है। लेकिन कस्तूरी मृग अनुसंधान केंद्र महरूड़ी के गेट पर लगा शिलान्यास पटल पर इसकी स्थापना वर्ष 1974 उल्लेखित है।

वर्ष 1986 में सरकार द्वारा अध्यादेश जारी कर पिथौरागढ़ जनपद में अस्कोट कस्तूरी मृग विहार की स्थापना की गई थी (Askot Musk Deer Sanctuary)।
रुद्रप्रयाग जनपद में केदारनाथ कस्तूरी मृग अभयारण्य (Kedarnath Musk Deer Sanctuary) स्थित है।
चमोली जनपद के गोपेश्वर में कांचुला खर्क (Kanchula Khark) नामक स्थान पर कस्तूरी मृग प्रजनन केंद्र स्थापित है (Kanchula Khark Musk Deer Breeding Centre)।
कांचुला खर्क में कस्तूरी मृग प्रजनन केंद्र की स्थापना 1980-81 में कस्तूरी मृग के अध्ययन और प्रजनन के लिए की गई थी। कांचुला खर्क कस्तूरी मृग प्रजनन केंद्र में वर्ष 1982 से 2004 तक 66 कस्तूरी मृगों का जन्म हुआ था।
(Report Source– https://cag.gov.in/uploads/old_reports/state/Uttarakhand/2006/Civil/civil_chap_3.pdf)
कुछ किताबों में कांचुला खर्क में स्थित कस्तूरी मृग प्रजनन केंद्र का स्थापना वर्ष 1982 बताया गया है।
उत्तराखण्ड का राजकीय वृक्ष – बुरांश (State Tree of Uttarakhand – Buransh)
उत्तराखण्ड का राजकीय वृक्ष बुरांश (State Tree of Uttarakhand is Buransh) है।
बुरांश का वैज्ञानिक नाम रोडोडेन्ड्रोन आर्बोरियम (Rhododendron Arboreum) है।
मार्च-अप्रैल के महीने में बुरांश के फूल खिलते हैं।
बुरांश का पेड़ एक सदाबहार पेड़ होता है।
भारत में बुरांश जम्मू कश्मीर से लेकर पूरे उत्तर हिमालयी क्षेत्र में पाया जाता है।
अभी तक बुरांश के 600 से अधिक प्रजातियों के बारे में हमें जानकारी प्राप्त है।
बुरांश का पेड़ 1400 मीटर से 3600 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में उगता है।
बुरांश वृक्ष के फूल गहरे लाल रंग के होते हैं।
बुरांश के पेड़ की ऊंचाई 20 से 25 फीट होती है।
उत्तराखण्ड के मशहूर कवि सुमित्रानंदन पन्त द्वारा बुरांश पर बहुत सारी कवितायेँ लिखी गयी हैं।
बुरांश के फूलों में औषधीय गुण मौजूद होते हैं। बुरांश के फूलों का जूस ह्रदय रोगियों और उच्च रक्तचाप के रोगियों के लिए लाभदायक होता है।
साथ ही बुरांश के फूलों का प्रयोग रंग बनाने में भी किया जाता है।
बुरांश के पेड़ों के अवैध कटान को रोकने के लिए इसे वन अधिनियम 1974 के अंतर्गत संरक्षित वृक्ष की श्रेणी में रखा गया है।
उत्तराखण्ड का राजकीय पुष्प – ब्रह्म कमल (State Flower of Uttarakhand – Brahma Kamal)
उत्तराखण्ड का राजकीय पुष्प ब्रह्म कमल (State Flower of Uttarakhand is Brahma Kamal) है।
ब्रह्म कमल का वैज्ञानिक नाम सौसुरिया ओबवल्लाटा (Saussurea Obvallata) है।
ब्रह्म कमल का फूल गुच्छे के आकार में उगता है। बीच का फूल हल्के पीले रंग का होता है और फूलों का तना और अगल-बगल के फूल बैंगनी रंग के होते हैं।
ब्रह्म कमल चट्टानों वाले इलाकों में उगता है।
ब्रह्म कमल समुद्र तल से 3600 मीटर से 4500 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में उगता है।
ब्रह्म कमल के पौधे की ऊंचाई 70 से 80 सेंटीमीटर तक होती है।
ब्रह्म कमल पुष्प अगस्त से सितम्बर माह तक खिलते हैं।
ब्रह्मकमल बारहमासी पौधा है (Brahma Kamal is a perennial plant)।
ब्रह्म कमल की अभी तक 410 प्रजातियां खोजी गयी हैं जिनमे से 61 प्रजाति के ब्रह्म कमल भारत में पाए जाते हैं। अकेले 24 प्रकार के ब्रह्म कमल उत्तराखण्ड में पाए जाते हैं।
ब्रह्म कमल की धार्मिक महत्ता है, इसे विभिन्न मंदिरों में अर्पित किया जाता है। बद्रीनाथ मंदिर में ब्रह्म कमल पुष्प चढ़ाये जाते हैं।
मान्यता है कि ब्रह्म कमल पुष्प भगवान ब्रह्मा का प्रिय पुष्प है। और भगवान ब्रह्मा जी के नाम पर ही इस पुष्प का नाम ब्रह्म कमल रखा गया है। माँ नंदा देवी को भी ब्रह्म कमल पुष्प अर्पित किये जाते हैं।
ब्रह्म कमल को स्थानीय भाषा में ‘कौंल पद्म’ कहा जाता है।
ब्रह्म कमल का वर्णन वेदों में भी देखने को मिलता है।
महाभारत के वन पर्व में ब्रह्म कमल को ‘सौगंधिक पुष्प’ कहा गया है।
उत्तराखण्ड की राजकीय तितली – वूली ब्रांडेड पीकॉक (State Butterfly of Uttarakhand – Woolly Branded Peacock)
7 नवम्बर 2016 को कॉमन पीकॉक तितली (Common Peacock), जिसका वैज्ञानिक नाम पैपिलियो बियानोर (Papilio bianor) है, को उत्तराखण्ड की राजकीय तितली घोषित किया गया था।
लेकिन ध्यान दें – हाल ही में किए गए एक वैज्ञानिक अध्ययन (Condamine et al. 2023) में वूली ब्रांडेड पीकॉक (Papilio polyctor) तितली को एक अलग प्रजाति के रूप में मान्यता दी गई है। इस अध्ययन में विस्तृत आणविक फाइलोजेनेटिक विश्लेषण के आधार पर वूली ब्रांडेड पीकॉक (Papilio polyctor) का पुनर्वर्गीकरण किया गया है।
Reference:
Condamine, F. L., R. Allio, E. L. Reboud, J. R. Dupuis, E. F. A. Toussaint, N. Mazet, S.-J. Hue, D. S. Lewis, K. Kunte, A. M. Cotton, F. A. H. Sperling. 2023. A comprehensive phylogeny and revised taxonomy illuminate the origin and diversification of the global radiation of Papilio (Lepidoptera: Papilionidae). Molecular Phylogenetics and Evolution, 107758.
उत्तराखण्ड सरकार द्वारा जब कॉमन पीकॉक (Papilio bianor) को राज्य तितली घोषित करने का नोटिफिकेशन जारी किया गया था, उस समय वूली ब्रांडेड पीकॉक (Woolly Branded Peacock) (Papilio polyctor) को कॉमन पीकॉक (Papilio bianor) की एक उप-प्रजाति के अंतर्गत रखा गया था।
नए वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार देखें तो उत्तराखण्ड की राजकीय तितली (State Butterfly of Uttarakhand) वूली ब्रांडेड पीकॉक (Woolly Branded Peacock) है। वूली ब्रांडेड पीकॉक तितली का वैज्ञानिक नाम पापिलियो पॉलिक्टर (Papilio polyctor) है।
हालाँकि, नोट करने वाली बात यह है कि राज्य सरकार द्वारा अभी राजकीय तितली के नाम के बदले जाने पर कोई अपडेट नहीं दिए हैं।
उत्तराखण्ड का राजकीय वाद्य यंत्र – ढोल (State Musical Instrument of Uttarakhand – Dhol)
उत्तराखण्ड का राजकीय वाद्य यंत्र ढोल है (State musical instrument of Uttarakhand)।
ढोल को उत्तराखण्ड का राजकीय वाद्य यन्त्र वर्ष 2015 में घोषित किया गया था।
उत्तराखण्ड के संस्कृति मंत्रालय द्वारा वाद्य यंत्र चुनने के लिए एक समिति का गठन किया था। इस समिति के अध्यक्ष जुगल किशोर थे। समिति के अन्य सदस्य – प्रीतम भरतवाण, उत्तम दास और सचिव योगेश भंडारी थे। इस समिति की रिपोर्ट के आधार पर 2015 में उत्तराखण्ड के तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत द्वारा ढोल को राजकीय वाद्य यन्त्र घोषित किया गया था।
नोट- राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह में देश के विभिन्न राज्यों से वाद्य यंत्र उत्सव में आये थे। उत्तराखण्ड राज्य से ‘हुड़का’ वाद्य यंत्र राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह में शामिल था।
उत्तराखण्ड का राजकीय खेल – फुटबॉल (State Sports of Uttarakhand – Football)
उत्तराखण्ड का राजकीय खेल फुटबॉल है (State Game of Uttarakhand is Football)।
फुटबॉल को उत्तराखण्ड का राजकीय खेल वर्ष 2011 में घोषित किया गया था।
उत्तराखण्ड का राज्य गीत (State Song of Uttarakhand)
उत्तराखण्ड का राज्य गीत (State Song of Uttarakhand) के शुरुआती बोल हैं – “उत्तराखण्ड देवभूमि, मातृभूमि, शत् शत् वंदन अभिनंदन………”।
उत्तराखण्ड के राज्य गीत के रचयिता नैनीताल जनपद के निवासी हेमंत बिष्ट हैं।
इसे उत्तराखण्ड का राज्य गीत वर्ष 2016 में घोषित किया गया था।
राज्य गीत के गायक नरेन्द्र सिंह नेगी और अनुराधा निराला हैं।
राज्य संस्कृति मंत्रालय द्वारा 2015 में राज्य गीत चयन समिति का गठन किया गया था। इस समिति में 6 सदस्य थे। उत्तराखण्ड राज्य गीत चयन समिति के अध्यक्ष लक्ष्मण सिंह बिष्ट ‘बटरोही’ थे। समिति के सह अध्यक्ष लोक गायक नरेन्द्र सिंह नेगी थे।
उत्तराखण्ड राज्य गीत हिंदी, कुमाउनी और गढ़वाली भाषा का प्रयोग कर तैयार किया गया है।
उत्तराखण्ड का राज्य गीत (State song of Uttarakhand) इस प्रकार है–
उत्तराखण्ड देवभूमि मातृभूमि शत शत वन्दन अभिनन्दन,
दर्शन संस्कृति धर्म साधना श्रम रंजित तेरा कण-कण।
अभिनन्दन! अभिनन्दन!
उत्तराखण्ड देवभूमि मातृभूमि शत शत वन्दन अभिनन्दन॥गंगा यमुना तेरा आँचल दिव्य हिमालय तेरा शीष
सब धर्मों की छाया तुझ पर चार धाम देते आशीष,
श्रीबद्री केदारनाथ हैं कलियर हेमकुण्ड अतिपावन।
अभिनन्दन! अभिनन्दन!
उत्तराखण्ड देवभूमि मातृभूमि शत शत वन्दन अभिनन्दन॥अमर शहीदों की धरती है थाती वीर जवानों की
आन्दोलनों की जननी है ये कर्मभूमि बलिदानों की,
फूले-फले तेरा यश वैभव तुझ पर अर्पित है तन-मन।
अभिनन्दन! अभिनन्दन!
उत्तराखण्ड देवभूमि मातृभूमि शत शत वन्दन अभिनन्दन॥रँगीली घाटी शौकों की याँ मडुवा झुँगरा भट अन-धन
ताल थाल बुग्याल गिली चर बून तराई भाबर बण,
भाँति-भाँति लगै गुँजर हैं चाहीं फिर लै उठास भरी छ मन।
अभिनन्दन! अभिनन्दन!
उत्तराखण्ड देवभूमि मातृभूमि शत शत वन्दन अभिनन्दन॥गौड़ी भैंस्यूँन गुँजता गोठ्यार ऐपण सज्या हर घर हर द्वार
आम धाण की धुरी बेटी-ब्वारी कला प्राण छन शिल्पकार,
बण पुँगड़ा सेरा पन्द्रों मा बँटणा छन सुख-दुख सँग-सँग।
अभिनन्दन! अभिनन्दन!
उत्तराखण्ड देवभूमि मातृभूमि शत शत वन्दन अभिनन्दन॥कस्तूरी मृग ब्रह्म कमल है भ्योंली बुराँस घुघुति मोनाल
ढोल नगाड़े दमुआ हुड़का रणसिंघा मुरुली सुर-ताल,
जागर हार में थड्या झुमैलो झ्वड़ा छपेली पाण्डव नर्तन।
अभिनन्दन! अभिनन्दन!
उत्तराखण्ड देवभूमि मातृभूमि शत शत वन्दन अभिनन्दन॥कुम्भ हरेला बसन्त फुल देई उतरिणी कौथिग नन्दा जात
सुमन केसरी जीतू माधो चन्द्र सिंह वीरों की थात,
जियारानी तीलू रौतेली गौरा पर गर्वित जन-जन।
अभिनन्दन! अभिनन्दन!
उत्तराखण्ड देवभूमि मातृभूमि शत शत वन्दन अभिनन्दन… शत शत वन्दन अभिनन्दन॥
उत्तराखण्ड राज्य गीत की PDF फाइल डाउनलोड करें (State Song of Uttarakhand PDF) –
उत्तराखण्ड की राजकीय मछली – स्वर्ण महाशीर (State Fish of Uttarakhand – Golden Mahseer)
उत्तराखण्ड की राजकीय मछली स्वर्ण महाशीर (State Fish of Uttarakhand is Golden Mahseer) है।
स्वर्ण महाशीर का वैज्ञानिक नाम टोर पुटिटोरा (Tor Putitora) है।
गोल्डन महाशीर मछली के शरीर का बाहरी भाग सुनहरा रंग का होता है और पंख लाल-पीले रंग के होते हैं।
स्वर्ण महाशीर भारत में सिन्धु, गंगा, हिमालय की तलहटी की नदियों, ब्रह्मपुत्र, कावेरी, कोसी, बालामोर आदि नदियों में पाई जाती हैं।
गोल्डन महाशीर मछली बाढ़ के दौरान प्रजनन करती हैं।
पूरे विश्व में स्वर्ण महाशीर (Golden Mahseer) मछली की 47 प्रजातियों में से 15 प्रजातियां भारत में मौजूद हैं।
गोल्डन महाशीर मछली के अत्यधिक पकड़े जाने, जल प्रदूषण आदि कारणों से इनकी जनसंख्या में कमी आई है।
गोल्डन महाशीर को अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति और प्राकृतिक संसाधन संरक्षण संघ (IUCN) द्वारा रेड लिस्ट में लुप्तप्राय के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।
उत्तराखण्ड की राजकीय भाषा (Official Languages of Uttarakhand)
उत्तराखण्ड की प्रथम राजभाषा हिंदी है और द्वितीय राजभाषा संस्कृत है (Official language of Uttarakhand)।
संस्कृत को द्वितीय राजभाषा का दर्जा तत्कालीन मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल “निशंक” द्वारा वर्ष 2010 में प्रदान किया गया था।
Frequently Asked Questions related to Uttarakhand State Symbols
प्रश्न – भारत के राजचिह्न के नीचे उल्लिखित ‘सत्यमेव जयते’ (सत्य की ही विजय होती है)। पद किस उपनिषद से लिया गया है?
उत्तर – मुंडक ((UPPCL JE Electrical 7 Sept 2021 Official Paper (Shift 1))
प्रश्न – उत्तराखंड का राज्य पशु क्या है?
उत्तर – कस्तूरी मृग (BHEL Engineer Trainee Civil Official Paper (2019) & UKPSC RO/ARO Paper 2 (2012)
प्रश्न – उत्तराखण्ड का राज्य वृक्ष क्या है?
उत्तर – बुरांश (UKPSC Prelims (2022))
प्रश्न – उत्तराखंड के राज्य पुष्प का नाम क्या है?
उत्तर – ब्रह्म कमल (PTCUL AE E&M 2017)
प्रश्न – उत्तराखण्ड का राजकीय वाद्य यन्त्र क्या है?
उत्तर – ढोल
प्रश्न – उत्तराखण्ड का राजकीय खेल क्या है?
उत्तर – फुटबॉल
प्रश्न – हिमालयी मोनाल का वैज्ञानिक नाम क्या है?
उत्तर – हिमालयी मोनाल का वैज्ञानिक नाम लोफोफोरस इम्पेजेनस (Lophophorus Impejanus) है।
प्रश्न – कस्तूरी मृग का वैज्ञानिक नाम क्या है?
उत्तर – मोस्कस क्राइसोगास्टर (Moschus Chrysogaster)
प्रश्न – बुरांश का वैज्ञानिक नाम क्या है?
उत्तर – रोडोडेन्ड्रोन आर्बोरियम (Rhododendron Arboreum)
प्रश्न – ब्रह्म कमल का वैज्ञानिक नाम क्या है?
उत्तर – सौसुरिया ओबवल्लाटा (Saussurea Obvallata)
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Class 6 NCERT History Notes for UPSC Chapter 1 WHAT, WHERE, HOW AND WHEN? | क्या, कब, कहाँ और कैसे?
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